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Saturday, 21 December 2013

तलाश


Saturday, 3 August 2013

प्रेम के कोई और मायने हैं क्या



" प्रेम ही जीवन की अंतिम उपलब्द्धि है और अंतिम तक इंतजार ही प्रेम की पराकाष्ठा। प्रेम के कोई और मायने हैं क्या ? "
                और तुमने मेरी हथेलिओं पर अपने होंठो से प्रेम लिखकर कहा " प्रेम में होकर भी कितना अर्थविहीन प्रश्न पूंछती हो। प्रेम की पराकाष्ठा इंतज़ार में नहीं, बल्कि प्रिय के न होने में भी होने को महसूस करने में है। " फिर तुमने उस रात गली के मुहाने पर क्षितिज से एक तारा तोडा और मेरी नाभि पर रखकर मुझसे प्रेम करने की अनुमति मांगी थी।

" प्रेम में अनुमति मांगकर क्यों प्रेम को कर्ज़दार कर रहे हो " फिर आँखों को मूँद लेना ही मेरी स्वीकृति थी और सहमति भी। रोशनी हमारे प्रेम पर लांछन न लगा दे, ये सोचकर बादलों ने चाँद की आँखों को ढक दिया। आहा ! प्रेम का सौंदर्य कितना अप्रतिम है ...'रूप का आभूषण और जीवन का श्रृंगार'। मेरे आभूषण कितने बनावटी लगने लगे थे। फिर मैंने अपनी रूह को तुम्हारे सुपुर्द कर दिया और तुमने मुझ पर से रहस्य की सब परतों को हटा दिया और मेरी देह शर्म के पर्दों से झांकती हुई कमल की एक- एक पंखुड़ी की तरह खुलने लगी। उस रात हमने प्रेम के शिखर पर पहुचकर प्रेममय होने के मायने जाने थे और प्रेम के मायनों में ही हमने जीवन के अर्थ तलाश लिए थे।

कहते हैं, जीवन का अंतिम सच मौत है, परन्तु प्रेम के शिखर पर पहुंचकर ये मलाल भी जाता रहा। तुमने सच कहा था कि प्रेम की पराकाष्ठा इंतज़ार में नहीं, बल्कि प्रिय के न होने में भी होने को महसूस करने में है। तुम्हारे न होने में भी तुम्हारा होना जान लिया है मैंने। प्रेम ही जीवन का अंतिम सच है। सचमुच, प्रेम के कोई और मायने नहीं हैं ....

Wednesday, 19 June 2013

अबकि बार तू सीता बनके मत आना



स्त्री तेरे हज़ारों रूप,
तू हर रूप में पावन,सुन्दर और मधुर।

पर अबकि बार तू सीता या राधा बनके मत आना,
द्रोपदी और दामिनी बनके भी मत आना,
तू जौहर में जलती वीरांगना और,
प्रेम के गीत गाती मीरा बनके भी मत आना,
मेरी तरह चुप्प,बेबस और मूर्ख बनके भी मत आना।

अबकि बार तुम गुस्सैल,बिगडैल और मुहफट लड़की बनके आना,
वहीँ जो अपनी आज़ादी का राग आलापते,मुंबई के एक हॉस्टल में रहती है।
और कल जिसने एक लड़के को बुरी तरह पीटा,
क्योंकि लड़का उसकी छाती पर कोहनी मार के निकल गया।

अबकि बार तुम शालीनता और सभ्यता के झंडे फहराने मत आना,
और वो मोहल्ले की रागिनी भाभी बनकर भी नहीं,
जिसकी सहेली से मिलने की इच्छा भी पति की इज़ाज़त पर निर्भर है।
तुम, वो काँधे पे स्वतंत्र मानसिकता का बैग टाँगे, समुद्र लांघ के
स्वीडन से इंडिया घूमने आई,दूरदर्शी और आत्मनिर्भर लड़की बनके आना।

अब नहीं बनके आना तुम मर्यादा न लांघने का प्रतीक,
तुम गली की गुंडी बनके आना।
ताकि तुम्हारी आबरू को घायल करने वाले ये नपुंसक,
तुम्हारे अस्मित को नोचने वाले ये दरिन्दे,
तुम्हारे दम भर घूरने से ही अपने बिलों में छिप कर बैठ जाएँ।
और घर की कुण्डी लगाके कमरे के बिस्तर पर न फेंकी जाएँ,
तुम्हारी ख्वाहिशें,स्त्री होने का ठप्पा लगकर।

अबकि बार तुम समाज के प्रहरियों के आदर्श-मूल्यों में,
अपनी संवेदनाओ और इच्छाओ को खंडित करके,
सीधी,चुप्प,दुपट्टा सम्हाले,'मासूम' गुडिया बनके मत आना।
तुम निडर,अमूक और आफतों से लड़-झगड़ने वाली,
अपनी प्राथमिकताएं स्वयं तय करने वाली,
सीमा,बंधन और गुलामी में अंतर कर पाने वाली,
उपहास,आलोचना,और उलाहना को गर्दो-गुबार करने वाली,
आज़ाद,खूबसूरत और खुले विचारों वाली,
जीवन से भरपूर वो पागल लड़की बनके आना।
मुझे तुम वैसी ही अच्छी लगती हो।

नैतिकता और आदर्शवाद के पुराने उदाहरण पर्याप्त हैं
हम बेटिओं,बहनों और स्त्रिओं के जीवन मूल्य तय करने के लिए
अब मेरे कस्बे की लडकियां तुम्हारे स्वछंद,स्वतंत्र
और बिंदास होने का उदाहरण देखना चाहती हैं,
समाज की परम्पराओं की जंजीरों में जकड़ी ये लडकियां,
तुम्हारे उस बिंदास व्यक्तित्व में कहीं न कहीं,
खुद का भी तुम्हारी तरह होना इमेजिन करती हैं।

                        -एकता नाहर 'मासूम'

Monday, 17 June 2013

चूड़ियाँ टूट ही गईं

लो,आज तो वो चूड़ियाँ भी टूट गईं जो तुम मेरे लिए फ़िरोज़ाबाद से लाये थे। वैसे मैंने तुम्हें बताया नहीं था,वो चूड़ियाँ तो कई दिनों पहले ही चटक गईं थीं...मैं तो वो चटकी हुई चूड़ियाँ ही पहन रही थी। तुमने भी तो कहाँ बताया मुझे कि हमारा रिश्ता चटक रहा है…टूट गया न,चटकते-चटकते।

तुम्हें चूड़ियो के चटकने का पता नहीं चला न, क्योंकि मेरी चूड़ियाँ चटकने के बाद भी पहले की ही तरह खनक रही थीं। मुझे भी कहाँ पता चला रिश्ते की चटक का, मुझे तो सिर्फ उसकी पहले जैसी खनक सुनाई दे रही थी। एक बार ही बता देते मुझे, तो मैं सहेजकर रख देती न,हमारे रिश्ते को अलमारी के किसी कोने में करीने से ....वहीँ,जहां मैं अपनी चूड़ियाँ रखती हूँ।

.......खैर,अब जब सब कुछ टूट ही चूका है तो चलो अच्छा ही हुआ जो आज ये रही-सही चूड़ियाँ भी टूट गईं....वरना, चटकी हुई चूड़ियाँ बेवजह मुझे जख्मी ही करतीं.......

Monday, 10 June 2013

उत्तर समान हो सकते थे ...


फासले तय कर लिए गये… हक़ बाँट लिए गये ..कभी न मिलने की कसमें ले ली गई ..हदें लिख ली गई और तो और किसका कितना प्यार था,कितनी गलतियाँ,ये भी लिख लिया गया...दोनों ही अपने पक्ष और तर्क देकर इसका गडित लगा रहे थे ....अपने हिसाब के दोनों ही पक्के थे ...सूत्र कोई भी लगाया जाये,आखिर में गडित के सवाल का हल सबका एक जैसा ही आता है… पर हम दोनों के उत्तर में असमानता निकली ...तुम्हारे उत्तर में तुम सही थे और मेरे उत्तर में मैं ...ज़रूर कोई भूल हो गई होगी किसी सूत्र के लगाने में ....फिर से जाँचना होगा कि भूल तुम्हारे हिसाब में थी या मेरे ...पर इतना वक़्त कहाँ था ...हम दोनों  ही अपने- अपने रास्ते पे आगे बढ़ चुके थे। हिसाब लगे पन्ने भी रद्दी का सामान हो चुके थे।

(भूल सुधारी जा सकती थी ...रिश्ते को वक़्त दिया जा सकता था ...उत्तर समान हो सकते थे ...)



Saturday, 8 June 2013

काश कि तुम होते तो तुमसे बाँट पाती...अपना दर्द भी ...अपनी राहतें भी...

टूटते बनते विश्वास,प्यार और अहंकार की तानाबानी में फसे रिश्ते ज्यादा वक़्त तक सांस नही ले पाते। हमारा रिश्ता भी तो कराह रहा है कबसे...हर सुबह खुद से तुम्हे याद न करने का वादा,सारा दिन उस वादे पर कायम रहने की नाकाम सी कोशिश और शाम होने तक अपने वादे को अपने ही पैरों तले रौंद कर तुम्हारे आगोश में बिछते मेरे एहसास। हर दिन बनते बिगड़ते इस रिश्ते, इन नाकाम सी कोशिशो और बेवजह की साजिशो के बीच दिल में टीस उठाता मेरा दर्द…और इस दर्द में राहत देती तुम्हारे पहलू में गुज़ारी रातों की खुशबू....
तुम जानते हो न, तुम्हारे पास आकर मुझे हर दर्द से राहत मिल जाती है...वो सारे दर्द जो न आँखों से आंसू बनकर झलक पाए न जुबान से लब्ज़ बनकर निकल पाए... 

काश!!! काश कि तुम होते तो तुमसे बाँट पाती...अपना दर्द भी...अपनी राहतें भी ...



Tuesday, 4 June 2013

वो बस प्रेम ही लिखती


वो बस प्रेम ही लिखती थी,और ग़ज़ब लिखती थी....पहले लोगों ने कहा कि उसकी कलम में जादू है,फ़िर वो उसे पागल कहने लगे और वह उसे ही उपलब्धि समझ बैठी। पागल (पा गल) तो वो होता है न,जिसने कोई गल पा ली हो...मीराबाई,हाँ उन्हें पागल कहा जा सकता है..प्रेम की गल जो पा ली थी उन्होंने।


उसे भी लोगों ने पागल,दीवानी,बावली,न जाने क्या-क्या कहा ...आकाश उसे एकटक देखता रहा ताकि वो उसकी विशालता लिखे। मौसम ने अपनी सब हरकतों से उसे रिझाने की कोशिश की। कुदरत में हर रोज़ नए करिश्मे होते रहे मगर वह अपनी वहीँ पुरानी प्रीत लिखती रही उसने तो अपनी जीभ पे प्रेम की डली रख ली थी,वह उसी का स्वाद चखती थी बाकी सब उसे फीका लगता था।उसे चुटकुले लिखकर लोगों को गुदगुदाना नहीं आया...वीरों की वीरता और महापुरुषों की महानता भी उसकी कलम से अछूती ही  रही ....

ओस की बूंदों की नरमी,रिमझिम फुहारें,गोबर से लिपे आँगन में खेलती नन्ही-सी गुडिया,कोलतार बिछी खाली सड़क पर ठेला चलता वो लड़का,बगीचे में खिलते गुड़हल के लाल फूल...जाने कितने ही विषयों को पनाह दे रहे थे एक से एक महान कवि ...मगर वो सब विषयों से रिक्त थी...उसने तो अपनी कलम को प्रेम की स्याही में डुबो रक्खा था ..ज्यों ही कागज़ पर कुछ उकेरती...प्रेम ही उल्छरता।

कुछ लोगों ने कहा कि वो प्रेम में है, अनुमान लगाकर उसके प्रेम को नाम और शक्ल भी दी। मगर वो कहती थी कि  प्रेम उसमे है...प्रेम उससे लिखवाता है अपनी परिभाषा...कभी वो अपने प्रेम को इश्वर की शक्ल देती तो कभी कुछ महान प्रेमिओ के किस्से लिखकर अपने प्रेम से कागज़ को रंग देती। 

उसे प्रेम के सिवा कोई दूसरा शब्द लिखना ही नहीं आया,वो पागल ही सही पर वो लिख रही है, अब भी प्रेम ही लिख रही है ......



वो पहली कविता..

तुम्हे  वो कविता याद है, जो मैंने पहली बार तुम्हारे लिए लिखी थी ...जितने ध्यान से मेरा दो साल का भतीजा यश तितलियाँ देखता है न और जितने ध्यान से तुम अपने ऑफिस और घर की जिम्मेदारियाँ निभाते हो,उतने ही ध्यान से लिखी थी,मैंने वह कविता तुम्हारे लिये. ..और तुमने भी तो उसको पढ़कर चूम लिया था,मैंने कहा था बस करो, कितनी बार पढोगे ......
           ......तुम भूल चुके हो न वह कविता, मुझे भी कहाँ याद थी ...वो तो आज पन्ने पलटते हुए वह कविता सामने आ गई। स्याही फीकी पड़ चुकी थी,कागज़ भी कुछ मुड़ सा गया था ...पर पन्नों के साथ अहसास कहाँ पुराने हुए,कविता भूलने से यादें कहाँ भूली ...जानती हूँ पन्ने पलटने से वक़्त नहीं पलटता ...पर शायद पलटता हो कि अगर तुम भी पलट लो कुछ पन्ने… तुम्हारे सामान में भी रखी हो कोई कविता ...कोई ख़त ...जिसके पढने से तुम्हे भी महसूस हो की अहसास पुराने नहीं होते ...और फिर शायद पलट जाये हमारा वक़्त… 


Thursday, 30 May 2013

समान्तर रेखाएं

तुम हमेशा अपने रास्ते पे चलते रहे और मैं तुम्हारे। मैं तुम्हारे साथ होने की बहुत कोशिश करती रही,पर तुम अपने रास्ते पे बहुत आगे थे। तुम्हारी प्राथमिकताएं तय थीं,मेरा रोल सिर्फ उनमे भागीदार होने का था,तुम्हारा रास्ता कभी भी प्यार न था, इसलिए मुझे ही बदलना था,अपने रास्ते,अपनी प्राथमिकताये... हमारे रास्ते एक होने के लिए। दो समान्तर रेखाओं की  तरह हम कब तक अपनी-अपनी मंजिल की तरफ बढ़ते रहते...किसी एक को तो विस्मृत होकर दूसरे में मिलना ही था...और मैं तैयार थी अपनी मंजिलें,अपने सपनों को उनके हाल पर छोड़कर तुम्हारे साथ चलने के लिए। तुम खुश थे कि तुम अपनी मंजिल की तरफ बढ़ रहे थे,मैं खुश थी कि  मैं तुम्हारे साथ चल रही थी और सब मुश्किलों से लड़कर हमने तय किया ये सफ़र। फिर मंजिल की चकाचौंध में तुमने अपने साथ चलते आये इस सांये को देखना ही बंद कर दिया और मैं बेसुध खड़ी रही आँखों में इल्तज़ा लिए हुए...अब मेरे पास न तुम्हारा साथ था न तुम्हारी मंजिलें...अपनी मंजिलो को तो मैं दूर कहीं छोड़ आई थी....

Monday, 27 May 2013

...और तुम कहते हो मैं तुम्हारे लिए कुछ नहीं लिखती

तुम अक्सर कहते हो न कि मैं तुम्हारे लिए कुछ नहीं लिखती। लगता है, मेरी नज़्म को ध्यान से पढ़ा नहीं तुमने। यही कहना चाहते हो न कि उसमे तो फूलों का,चाँद का, हवाओं का और मेरे अहसासों का ज़िक्र होता है,तुम्हारा नहीं ....। सुनो,ये उपमाये तुम्हारे लिए ही तो लिखी हैं। अब प्रेम लिखूं या इंतज़ार, दर्द लिखूं या राहत,तुम्हारे ख्यालों को ही तो घूँट-घूँट पीकर कोई नज़्म रचती है मेरी कलम। मेरे बगीचे में खिलते अमलताश और गुलमोहर के फूल भी मुझे मुह चिडाते हैं कि मैं उनके रंगों में तुम्हे रंगती हूँ, उनकी खुशबू में तुम्हे महकाती हूँ और उनका ज़िक्र करके तुम्हारे अहसास बुनती हूँ और ये चाँद आज अमावस का बहाना करके मेरी छत पे भी नहीं आया कि मैं उसे देखकर, उसकी चांदनी में अपने रोम-रोम को भिगोकर तुम्हे महसूस करती हूँ। जिस दिन से तुमने अपनी नज़रों से मेरी रूह को सुलगाया है ना… उस दिन से मेरी कलम तुम्हे लिखकर ही सुकून पाती है…और तुम कहते हो मैं तुम्हारे लिए कुछ नहीं लिखती ....


Sunday, 26 May 2013

अब चलना नहीं चढ़ना होगा…


हार जीत के पैमानों में झूलती ये ज़िन्दगी ...
कि यकायक मैदान सी हो गयी समतल,
फ़िर ...बहुत वक़्त से ..इसी हार के मैदान में 
बढ़ रही थी ज़िन्दगी ...
कि अब जाके नज़र आ रहा है,
दूर कहीं जीत का पहाड़ ...
मुश्किल बहुत है शिखर तक पहुंचना 
पहाड़ की ऊंचाईयाँ चढ़ना भूल चुकी हूँ अब,
मैदान पे चलने की आदत सी हो गयी है… 
पर आदतें बदलनी होगी,
जीत के शिखर तक पहुचने के लिए 
अब चलना नहीं चढ़ना होगा… 

Tuesday, 21 May 2013

काश कि तुम होते तो तुम सुन पाते ...ये शोर भी ...ये सन्नाटा भी ...


देखो ना तुमसे बातें करती हूँ तो अल्फाजों को लबों तक आने के लिए दिमाग से तानाबानी नहीं करनी पड़ती,पर इन पन्नों तक पहुंचा हर लफ्ज़ दिल से दिमाग तक का रास्ता तय करके आया है ....तो कैसे मान लूँ कि इन पन्नों से भी बेझिझक सब कह पाऊंगी, उसी पागलपन के साथ… जैसे तुमसे बिना सोचे समझे बोलती रहती हूँ ...डरती हूँ कि कहीं कुछ सच अधूरे न रह जाएँ .... इन पन्नों तक आते आते झूठ के नकाब में न छिप जाएँ ...मेरे दिल में उठा विचारों का, अल्फाजों का और भावनाओं का समंदर तो तुम तक ही अपना शोर, अपनी पीड़ा पहुंचाकर शांत होता है…

काश !!!काश कि तुम होते तो तुम सुन पाते ...ये शोर भी ...ये सन्नाटा भी ...

Sunday, 19 May 2013

मेरी उड़ान

चंचल सा मेरा मन ...
अनंत आकाश में अपनी दिशा ढूंढता हुआ
और… सपनो को नोचते हुए मेरे हालात,
जमीं की और ताकता हुआ मेरा डर,
मुमकिन नामुमकिन की परिभाषा सिखाते हुए मेरे विचार,
पर ...कहाँ समझ पाया है ये मन,
किसी भी परिभाषा, समझौते या डर को…
इसने तो जब से आकाश देखा,
उड़ने का सबब भी न था सीखा था,
और उड़ाने भर दीं ...
अब कहाँ रुक पायेगा ये,तुम्हारे या मेरे रोकने से। 
अब नहीं नज़र आयेंगे इसको जमी पर खड़े,
डर, रुकावटें, हार और मुश्किलें ...

Saturday, 18 May 2013

वो भीड़ में खोने वाला चेहरा नहीं था


वो सिर्फ एक बार ही मिला था उसे, बस में...जान-पहचान से ज्यादा बातें भी नहीं हो पाईं थी...एक कशिश थी उसमे,जिसमे खिंचती हुई वह बार-बार उसे मिलना चाहती थी। कई दिनों तक उसने रोज उसी बस में उसका इंतजार किया...पर ऐसे तो न जाने कितने चेहरे मिलकर भीड़ में गुम हो जाते हैं...फिर धीरे-धीरे उसकी स्मृति से वो कशिश,वो चेहरा,वो झलक धुंधले होते चले गए...एक अजनबी का इंतज़ार वो भला कब तक करती।
             ...आज अचानक वो उसे फिर दिखाई दिया...भीड़ में। वहीँ खुशबू जिसने उसे 5 साल पहले महकाया था...फिर जाने कहाँ हवाओं में बिखर कर खो गयी थी ...आज इतने वक़्त के बाद हवाएं फिर वहीँ खुशबू समेट लायीं थी,उसे महकाने के लिए। फिर,वो खो गई उसके मखमली और मुलायम अहसासों की नरमी में ...दोनों ने जी भर कर बातें की ...जैसे एक अधूरा रिश्ता छोड़ आये थे कहीं, उसे पूरा करने चले हों या फिर ये शुरुआत थी एक नए रिश्ते की ...
पर इस बार अगर वो अलग हुए तो अब ये यादें उसकी स्मृति से नहीं मिट पाएगी ...अब साँसों के रुकने तक उसकी रूह उसीकी खुशबू से महकती रहेगी ...अब वो भीड़ में खोने वाला चेहरा नहीं था।

Friday, 17 May 2013

तुम यही हो


पिघलती रात, मचलते जज्वात
और सरसराती हवाएं ....
लगता है कि तुम यही हो 

मेरे कानो को छूती तुम्हारी उंगलियाँ,
मेरी साँसों से टकराती तुम्हारी साँसे 
मेरे गालों को चूमते तुम्हारे लव 

हाँ मैं जानती हूँ, तुम यही हो,
मेरी तन्हाई में,मेरी ख़ामोशी में,मेरी बैचेनियो में।

Thursday, 16 May 2013

मेरा रॉकेट

छोटी सी तो जिद है, नादां से इस मन की,
कि मुझे तो आसमां के उस पार जाना है।
यूँ तो लोग कहते हैं कि ...
बढ़ता घटता चाँद, जगमगाते तारे,
आग के गोले सा सूरज और बादल सारे,
इसके सिवा उस नीले फलक में,
और कुछ भी नहीं,
पर मुझको यकीं है कि इन चाँद तारों से परे,
दूर कहीं मेरी मंजिल है,वही मुझे पहुंचना है।
जैसे मेरा रॉकेट,
आसमां में पहुँच के जगमगाता है,
कि वो जानता है, उसकी मंजिल उंचाई है,
इन चाँद तारो के बीच उसको भी कहीं चमकना है ...


Wednesday, 15 May 2013

काश कि तुम होते तो तुमसे कह पाती...अपनी बैचैनियाँ भी... अपना सूकून भी


आज सालों बाद अपने विचारों में चल रहे संघर्ष को इस डायरी में समेट पाना कितना मुश्किल सा लग रहा है…कितने ही राज़,कितनी ही बाते ,कितने ही सच, कितनी ही ख्वाहिशें कई बार ऐसे ही डायरी पर लिख लिखकर फाड़ी है… और अब तो लगता है कि जैसे लिखना भूल चुकी हूँ मै ...इस शहर की गलियों की तरह मेरी ज़िन्दगी भी सकरी हो चली है…. प्यार, रिश्ते, दोस्ती सबसे खाली ...और आज तो शब्दों से भी ...

काश!!! काश कि तुम होते तो तुमसे कह पाती ... अपनी बैचैनियाँ भी .... अपना सूकून भी ....