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Thursday, 30 May 2013

समान्तर रेखाएं

तुम हमेशा अपने रास्ते पे चलते रहे और मैं तुम्हारे। मैं तुम्हारे साथ होने की बहुत कोशिश करती रही,पर तुम अपने रास्ते पे बहुत आगे थे। तुम्हारी प्राथमिकताएं तय थीं,मेरा रोल सिर्फ उनमे भागीदार होने का था,तुम्हारा रास्ता कभी भी प्यार न था, इसलिए मुझे ही बदलना था,अपने रास्ते,अपनी प्राथमिकताये... हमारे रास्ते एक होने के लिए। दो समान्तर रेखाओं की  तरह हम कब तक अपनी-अपनी मंजिल की तरफ बढ़ते रहते...किसी एक को तो विस्मृत होकर दूसरे में मिलना ही था...और मैं तैयार थी अपनी मंजिलें,अपने सपनों को उनके हाल पर छोड़कर तुम्हारे साथ चलने के लिए। तुम खुश थे कि तुम अपनी मंजिल की तरफ बढ़ रहे थे,मैं खुश थी कि  मैं तुम्हारे साथ चल रही थी और सब मुश्किलों से लड़कर हमने तय किया ये सफ़र। फिर मंजिल की चकाचौंध में तुमने अपने साथ चलते आये इस सांये को देखना ही बंद कर दिया और मैं बेसुध खड़ी रही आँखों में इल्तज़ा लिए हुए...अब मेरे पास न तुम्हारा साथ था न तुम्हारी मंजिलें...अपनी मंजिलो को तो मैं दूर कहीं छोड़ आई थी....

Monday, 27 May 2013

...और तुम कहते हो मैं तुम्हारे लिए कुछ नहीं लिखती

तुम अक्सर कहते हो न कि मैं तुम्हारे लिए कुछ नहीं लिखती। लगता है, मेरी नज़्म को ध्यान से पढ़ा नहीं तुमने। यही कहना चाहते हो न कि उसमे तो फूलों का,चाँद का, हवाओं का और मेरे अहसासों का ज़िक्र होता है,तुम्हारा नहीं ....। सुनो,ये उपमाये तुम्हारे लिए ही तो लिखी हैं। अब प्रेम लिखूं या इंतज़ार, दर्द लिखूं या राहत,तुम्हारे ख्यालों को ही तो घूँट-घूँट पीकर कोई नज़्म रचती है मेरी कलम। मेरे बगीचे में खिलते अमलताश और गुलमोहर के फूल भी मुझे मुह चिडाते हैं कि मैं उनके रंगों में तुम्हे रंगती हूँ, उनकी खुशबू में तुम्हे महकाती हूँ और उनका ज़िक्र करके तुम्हारे अहसास बुनती हूँ और ये चाँद आज अमावस का बहाना करके मेरी छत पे भी नहीं आया कि मैं उसे देखकर, उसकी चांदनी में अपने रोम-रोम को भिगोकर तुम्हे महसूस करती हूँ। जिस दिन से तुमने अपनी नज़रों से मेरी रूह को सुलगाया है ना… उस दिन से मेरी कलम तुम्हे लिखकर ही सुकून पाती है…और तुम कहते हो मैं तुम्हारे लिए कुछ नहीं लिखती ....


Sunday, 26 May 2013

अब चलना नहीं चढ़ना होगा…


हार जीत के पैमानों में झूलती ये ज़िन्दगी ...
कि यकायक मैदान सी हो गयी समतल,
फ़िर ...बहुत वक़्त से ..इसी हार के मैदान में 
बढ़ रही थी ज़िन्दगी ...
कि अब जाके नज़र आ रहा है,
दूर कहीं जीत का पहाड़ ...
मुश्किल बहुत है शिखर तक पहुंचना 
पहाड़ की ऊंचाईयाँ चढ़ना भूल चुकी हूँ अब,
मैदान पे चलने की आदत सी हो गयी है… 
पर आदतें बदलनी होगी,
जीत के शिखर तक पहुचने के लिए 
अब चलना नहीं चढ़ना होगा… 

Tuesday, 21 May 2013

काश कि तुम होते तो तुम सुन पाते ...ये शोर भी ...ये सन्नाटा भी ...


देखो ना तुमसे बातें करती हूँ तो अल्फाजों को लबों तक आने के लिए दिमाग से तानाबानी नहीं करनी पड़ती,पर इन पन्नों तक पहुंचा हर लफ्ज़ दिल से दिमाग तक का रास्ता तय करके आया है ....तो कैसे मान लूँ कि इन पन्नों से भी बेझिझक सब कह पाऊंगी, उसी पागलपन के साथ… जैसे तुमसे बिना सोचे समझे बोलती रहती हूँ ...डरती हूँ कि कहीं कुछ सच अधूरे न रह जाएँ .... इन पन्नों तक आते आते झूठ के नकाब में न छिप जाएँ ...मेरे दिल में उठा विचारों का, अल्फाजों का और भावनाओं का समंदर तो तुम तक ही अपना शोर, अपनी पीड़ा पहुंचाकर शांत होता है…

काश !!!काश कि तुम होते तो तुम सुन पाते ...ये शोर भी ...ये सन्नाटा भी ...

Sunday, 19 May 2013

मेरी उड़ान

चंचल सा मेरा मन ...
अनंत आकाश में अपनी दिशा ढूंढता हुआ
और… सपनो को नोचते हुए मेरे हालात,
जमीं की और ताकता हुआ मेरा डर,
मुमकिन नामुमकिन की परिभाषा सिखाते हुए मेरे विचार,
पर ...कहाँ समझ पाया है ये मन,
किसी भी परिभाषा, समझौते या डर को…
इसने तो जब से आकाश देखा,
उड़ने का सबब भी न था सीखा था,
और उड़ाने भर दीं ...
अब कहाँ रुक पायेगा ये,तुम्हारे या मेरे रोकने से। 
अब नहीं नज़र आयेंगे इसको जमी पर खड़े,
डर, रुकावटें, हार और मुश्किलें ...

Saturday, 18 May 2013

वो भीड़ में खोने वाला चेहरा नहीं था


वो सिर्फ एक बार ही मिला था उसे, बस में...जान-पहचान से ज्यादा बातें भी नहीं हो पाईं थी...एक कशिश थी उसमे,जिसमे खिंचती हुई वह बार-बार उसे मिलना चाहती थी। कई दिनों तक उसने रोज उसी बस में उसका इंतजार किया...पर ऐसे तो न जाने कितने चेहरे मिलकर भीड़ में गुम हो जाते हैं...फिर धीरे-धीरे उसकी स्मृति से वो कशिश,वो चेहरा,वो झलक धुंधले होते चले गए...एक अजनबी का इंतज़ार वो भला कब तक करती।
             ...आज अचानक वो उसे फिर दिखाई दिया...भीड़ में। वहीँ खुशबू जिसने उसे 5 साल पहले महकाया था...फिर जाने कहाँ हवाओं में बिखर कर खो गयी थी ...आज इतने वक़्त के बाद हवाएं फिर वहीँ खुशबू समेट लायीं थी,उसे महकाने के लिए। फिर,वो खो गई उसके मखमली और मुलायम अहसासों की नरमी में ...दोनों ने जी भर कर बातें की ...जैसे एक अधूरा रिश्ता छोड़ आये थे कहीं, उसे पूरा करने चले हों या फिर ये शुरुआत थी एक नए रिश्ते की ...
पर इस बार अगर वो अलग हुए तो अब ये यादें उसकी स्मृति से नहीं मिट पाएगी ...अब साँसों के रुकने तक उसकी रूह उसीकी खुशबू से महकती रहेगी ...अब वो भीड़ में खोने वाला चेहरा नहीं था।

Friday, 17 May 2013

तुम यही हो


पिघलती रात, मचलते जज्वात
और सरसराती हवाएं ....
लगता है कि तुम यही हो 

मेरे कानो को छूती तुम्हारी उंगलियाँ,
मेरी साँसों से टकराती तुम्हारी साँसे 
मेरे गालों को चूमते तुम्हारे लव 

हाँ मैं जानती हूँ, तुम यही हो,
मेरी तन्हाई में,मेरी ख़ामोशी में,मेरी बैचेनियो में।

Thursday, 16 May 2013

मेरा रॉकेट

छोटी सी तो जिद है, नादां से इस मन की,
कि मुझे तो आसमां के उस पार जाना है।
यूँ तो लोग कहते हैं कि ...
बढ़ता घटता चाँद, जगमगाते तारे,
आग के गोले सा सूरज और बादल सारे,
इसके सिवा उस नीले फलक में,
और कुछ भी नहीं,
पर मुझको यकीं है कि इन चाँद तारों से परे,
दूर कहीं मेरी मंजिल है,वही मुझे पहुंचना है।
जैसे मेरा रॉकेट,
आसमां में पहुँच के जगमगाता है,
कि वो जानता है, उसकी मंजिल उंचाई है,
इन चाँद तारो के बीच उसको भी कहीं चमकना है ...


Wednesday, 15 May 2013

काश कि तुम होते तो तुमसे कह पाती...अपनी बैचैनियाँ भी... अपना सूकून भी


आज सालों बाद अपने विचारों में चल रहे संघर्ष को इस डायरी में समेट पाना कितना मुश्किल सा लग रहा है…कितने ही राज़,कितनी ही बाते ,कितने ही सच, कितनी ही ख्वाहिशें कई बार ऐसे ही डायरी पर लिख लिखकर फाड़ी है… और अब तो लगता है कि जैसे लिखना भूल चुकी हूँ मै ...इस शहर की गलियों की तरह मेरी ज़िन्दगी भी सकरी हो चली है…. प्यार, रिश्ते, दोस्ती सबसे खाली ...और आज तो शब्दों से भी ...

काश!!! काश कि तुम होते तो तुमसे कह पाती ... अपनी बैचैनियाँ भी .... अपना सूकून भी ....