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Wednesday, 15 May 2013

काश कि तुम होते तो तुमसे कह पाती...अपनी बैचैनियाँ भी... अपना सूकून भी


आज सालों बाद अपने विचारों में चल रहे संघर्ष को इस डायरी में समेट पाना कितना मुश्किल सा लग रहा है…कितने ही राज़,कितनी ही बाते ,कितने ही सच, कितनी ही ख्वाहिशें कई बार ऐसे ही डायरी पर लिख लिखकर फाड़ी है… और अब तो लगता है कि जैसे लिखना भूल चुकी हूँ मै ...इस शहर की गलियों की तरह मेरी ज़िन्दगी भी सकरी हो चली है…. प्यार, रिश्ते, दोस्ती सबसे खाली ...और आज तो शब्दों से भी ...

काश!!! काश कि तुम होते तो तुमसे कह पाती ... अपनी बैचैनियाँ भी .... अपना सूकून भी ....


3 comments:

Dr. Ashok Madhup said...

Ekta Ji Bahut sundar blog hai aapka. Laghu Kathayen aur Kavitayen bhi bahut achchhi hain. Badhai ho.

alka_astrologer said...

bahut hi badhiya i like your blog soft good and bhavnao ka sahi tariek se darsha pana hi kavit ahain kahani hain

संजय भास्‍कर said...

उम्दा सोच
भावमय करते शब्‍दों के साथ गजब का लेखन ...आभार ।