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Friday, 17 May 2013

तुम यही हो


पिघलती रात, मचलते जज्वात
और सरसराती हवाएं ....
लगता है कि तुम यही हो 

मेरे कानो को छूती तुम्हारी उंगलियाँ,
मेरी साँसों से टकराती तुम्हारी साँसे 
मेरे गालों को चूमते तुम्हारे लव 

हाँ मैं जानती हूँ, तुम यही हो,
मेरी तन्हाई में,मेरी ख़ामोशी में,मेरी बैचेनियो में।

3 comments:

संजय भास्‍कर said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति संवेदनशील हृदयस्पर्शी मन के भावों को बहुत गहराई से लिखा है

संजय भास्‍कर said...

आपका ब्लॉग पसंद आया....इस उम्मीद में की आगे भी ऐसे ही रचनाये पड़ने को मिलेंगी....

कभी फुर्सत मिले तो नाचीज़ की दहलीज़ पर भी आयें-

मदन मोहन सक्सेना said...

सुन्दर ,सरल और प्रभाबशाली रचना। बधाई। कभी यहाँ भी पधारें।
सादर मदन
http://saxenamadanmohan1969.blogspot.in/
http://saxenamadanmohan.blogspot.in/