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Saturday, 18 May 2013

वो भीड़ में खोने वाला चेहरा नहीं था


वो सिर्फ एक बार ही मिला था उसे, बस में...जान-पहचान से ज्यादा बातें भी नहीं हो पाईं थी...एक कशिश थी उसमे,जिसमे खिंचती हुई वह बार-बार उसे मिलना चाहती थी। कई दिनों तक उसने रोज उसी बस में उसका इंतजार किया...पर ऐसे तो न जाने कितने चेहरे मिलकर भीड़ में गुम हो जाते हैं...फिर धीरे-धीरे उसकी स्मृति से वो कशिश,वो चेहरा,वो झलक धुंधले होते चले गए...एक अजनबी का इंतज़ार वो भला कब तक करती।
             ...आज अचानक वो उसे फिर दिखाई दिया...भीड़ में। वहीँ खुशबू जिसने उसे 5 साल पहले महकाया था...फिर जाने कहाँ हवाओं में बिखर कर खो गयी थी ...आज इतने वक़्त के बाद हवाएं फिर वहीँ खुशबू समेट लायीं थी,उसे महकाने के लिए। फिर,वो खो गई उसके मखमली और मुलायम अहसासों की नरमी में ...दोनों ने जी भर कर बातें की ...जैसे एक अधूरा रिश्ता छोड़ आये थे कहीं, उसे पूरा करने चले हों या फिर ये शुरुआत थी एक नए रिश्ते की ...
पर इस बार अगर वो अलग हुए तो अब ये यादें उसकी स्मृति से नहीं मिट पाएगी ...अब साँसों के रुकने तक उसकी रूह उसीकी खुशबू से महकती रहेगी ...अब वो भीड़ में खोने वाला चेहरा नहीं था।

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