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Sunday, 19 May 2013

मेरी उड़ान

चंचल सा मेरा मन ...
अनंत आकाश में अपनी दिशा ढूंढता हुआ
और… सपनो को नोचते हुए मेरे हालात,
जमीं की और ताकता हुआ मेरा डर,
मुमकिन नामुमकिन की परिभाषा सिखाते हुए मेरे विचार,
पर ...कहाँ समझ पाया है ये मन,
किसी भी परिभाषा, समझौते या डर को…
इसने तो जब से आकाश देखा,
उड़ने का सबब भी न था सीखा था,
और उड़ाने भर दीं ...
अब कहाँ रुक पायेगा ये,तुम्हारे या मेरे रोकने से। 
अब नहीं नज़र आयेंगे इसको जमी पर खड़े,
डर, रुकावटें, हार और मुश्किलें ...

1 comments:

संजय भास्‍कर said...

वाह पहली बार पढ़ा आपको बहुत अच्छा लगा.
आप बहुत अच्छा लिखती हैं और गहरा भी.
बधाई.