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Tuesday, 21 May 2013

काश कि तुम होते तो तुम सुन पाते ...ये शोर भी ...ये सन्नाटा भी ...


देखो ना तुमसे बातें करती हूँ तो अल्फाजों को लबों तक आने के लिए दिमाग से तानाबानी नहीं करनी पड़ती,पर इन पन्नों तक पहुंचा हर लफ्ज़ दिल से दिमाग तक का रास्ता तय करके आया है ....तो कैसे मान लूँ कि इन पन्नों से भी बेझिझक सब कह पाऊंगी, उसी पागलपन के साथ… जैसे तुमसे बिना सोचे समझे बोलती रहती हूँ ...डरती हूँ कि कहीं कुछ सच अधूरे न रह जाएँ .... इन पन्नों तक आते आते झूठ के नकाब में न छिप जाएँ ...मेरे दिल में उठा विचारों का, अल्फाजों का और भावनाओं का समंदर तो तुम तक ही अपना शोर, अपनी पीड़ा पहुंचाकर शांत होता है…

काश !!!काश कि तुम होते तो तुम सुन पाते ...ये शोर भी ...ये सन्नाटा भी ...

2 comments:

संजय भास्‍कर said...

सोचा की बेहतरीन पंक्तियाँ चुन के तारीफ करून ... मगर पूरी नज़्म ही शानदार है ...आपने लफ्ज़ दिए है अपने एहसास को ... दिल छु लेने वाली रचना ...

प्रशांत मलिक said...

nice thoughts..