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Thursday, 16 May 2013

मेरा रॉकेट

छोटी सी तो जिद है, नादां से इस मन की,
कि मुझे तो आसमां के उस पार जाना है।
यूँ तो लोग कहते हैं कि ...
बढ़ता घटता चाँद, जगमगाते तारे,
आग के गोले सा सूरज और बादल सारे,
इसके सिवा उस नीले फलक में,
और कुछ भी नहीं,
पर मुझको यकीं है कि इन चाँद तारों से परे,
दूर कहीं मेरी मंजिल है,वही मुझे पहुंचना है।
जैसे मेरा रॉकेट,
आसमां में पहुँच के जगमगाता है,
कि वो जानता है, उसकी मंजिल उंचाई है,
इन चाँद तारो के बीच उसको भी कहीं चमकना है ...


1 comments:

संजय भास्‍कर said...

प्रशंसनीय रचना - बधाई
शब्दों की मुस्कुराहट पर ….माँ तुम्हारे लिए हर पंक्ति छोटी है

शब्दों की मुस्कुराहट पर ….सुख दुःख इसी का नाम जिंदगी है :)