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Monday, 10 June 2013

उत्तर समान हो सकते थे ...


फासले तय कर लिए गये… हक़ बाँट लिए गये ..कभी न मिलने की कसमें ले ली गई ..हदें लिख ली गई और तो और किसका कितना प्यार था,कितनी गलतियाँ,ये भी लिख लिया गया...दोनों ही अपने पक्ष और तर्क देकर इसका गडित लगा रहे थे ....अपने हिसाब के दोनों ही पक्के थे ...सूत्र कोई भी लगाया जाये,आखिर में गडित के सवाल का हल सबका एक जैसा ही आता है… पर हम दोनों के उत्तर में असमानता निकली ...तुम्हारे उत्तर में तुम सही थे और मेरे उत्तर में मैं ...ज़रूर कोई भूल हो गई होगी किसी सूत्र के लगाने में ....फिर से जाँचना होगा कि भूल तुम्हारे हिसाब में थी या मेरे ...पर इतना वक़्त कहाँ था ...हम दोनों  ही अपने- अपने रास्ते पे आगे बढ़ चुके थे। हिसाब लगे पन्ने भी रद्दी का सामान हो चुके थे।

(भूल सुधारी जा सकती थी ...रिश्ते को वक़्त दिया जा सकता था ...उत्तर समान हो सकते थे ...)



3 comments:

dilip tetarbe said...

जब दो व्यक्तियों के बीच बने संबंध लेखा-जोखा पर आधारित हो...लेखा-जोखा करते एक दूसरे की गलतियाँ गिनने की बात प्रारंभ जाए...तो ऐसे संबंध का प्रेम शब्द से कोई संबंध नहीं होता है...यह संबंधों का व्यवसाय है...'मेरी डायरी' में आज के युगानुरूप बातें आपने रखीं हैं...दूर तलक जाएंगी...दिलीप तेतरवे

jyoti khare said...

प्यार को ज्यादा सम्हलने में प्यार तितर-बितर हो जाता है
प्यार के संदर्भ में सार्थक रपट

आग्रह है मेरे ब्लॉग में भी सम्मलित हों
पापा ---------

prashant said...

Sachhai mat likha karo kuch yaden taja ho jati hain...