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Thursday, 30 May 2013

समान्तर रेखाएं

तुम हमेशा अपने रास्ते पे चलते रहे और मैं तुम्हारे। मैं तुम्हारे साथ होने की बहुत कोशिश करती रही,पर तुम अपने रास्ते पे बहुत आगे थे। तुम्हारी प्राथमिकताएं तय थीं,मेरा रोल सिर्फ उनमे भागीदार होने का था,तुम्हारा रास्ता कभी भी प्यार न था, इसलिए मुझे ही बदलना था,अपने रास्ते,अपनी प्राथमिकताये... हमारे रास्ते एक होने के लिए। दो समान्तर रेखाओं की  तरह हम कब तक अपनी-अपनी मंजिल की तरफ बढ़ते रहते...किसी एक को तो विस्मृत होकर दूसरे में मिलना ही था...और मैं तैयार थी अपनी मंजिलें,अपने सपनों को उनके हाल पर छोड़कर तुम्हारे साथ चलने के लिए। तुम खुश थे कि तुम अपनी मंजिल की तरफ बढ़ रहे थे,मैं खुश थी कि  मैं तुम्हारे साथ चल रही थी और सब मुश्किलों से लड़कर हमने तय किया ये सफ़र। फिर मंजिल की चकाचौंध में तुमने अपने साथ चलते आये इस सांये को देखना ही बंद कर दिया और मैं बेसुध खड़ी रही आँखों में इल्तज़ा लिए हुए...अब मेरे पास न तुम्हारा साथ था न तुम्हारी मंजिलें...अपनी मंजिलो को तो मैं दूर कहीं छोड़ आई थी....

1 comments:

संजय भास्‍कर said...

बहुत ही अच्छी लगी मुझे रचना........शुभकामनायें ।