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Wednesday, 19 June 2013

अबकि बार तू सीता बनके मत आना



स्त्री तेरे हज़ारों रूप,
तू हर रूप में पावन,सुन्दर और मधुर।

पर अबकि बार तू सीता या राधा बनके मत आना,
द्रोपदी और दामिनी बनके भी मत आना,
तू जौहर में जलती वीरांगना और,
प्रेम के गीत गाती मीरा बनके भी मत आना,
मेरी तरह चुप्प,बेबस और मूर्ख बनके भी मत आना।

अबकि बार तुम गुस्सैल,बिगडैल और मुहफट लड़की बनके आना,
वहीँ जो अपनी आज़ादी का राग आलापते,मुंबई के एक हॉस्टल में रहती है।
और कल जिसने एक लड़के को बुरी तरह पीटा,
क्योंकि लड़का उसकी छाती पर कोहनी मार के निकल गया।

अबकि बार तुम शालीनता और सभ्यता के झंडे फहराने मत आना,
और वो मोहल्ले की रागिनी भाभी बनकर भी नहीं,
जिसकी सहेली से मिलने की इच्छा भी पति की इज़ाज़त पर निर्भर है।
तुम, वो काँधे पे स्वतंत्र मानसिकता का बैग टाँगे, समुद्र लांघ के
स्वीडन से इंडिया घूमने आई,दूरदर्शी और आत्मनिर्भर लड़की बनके आना।

अब नहीं बनके आना तुम मर्यादा न लांघने का प्रतीक,
तुम गली की गुंडी बनके आना।
ताकि तुम्हारी आबरू को घायल करने वाले ये नपुंसक,
तुम्हारे अस्मित को नोचने वाले ये दरिन्दे,
तुम्हारे दम भर घूरने से ही अपने बिलों में छिप कर बैठ जाएँ।
और घर की कुण्डी लगाके कमरे के बिस्तर पर न फेंकी जाएँ,
तुम्हारी ख्वाहिशें,स्त्री होने का ठप्पा लगकर।

अबकि बार तुम समाज के प्रहरियों के आदर्श-मूल्यों में,
अपनी संवेदनाओ और इच्छाओ को खंडित करके,
सीधी,चुप्प,दुपट्टा सम्हाले,'मासूम' गुडिया बनके मत आना।
तुम निडर,अमूक और आफतों से लड़-झगड़ने वाली,
अपनी प्राथमिकताएं स्वयं तय करने वाली,
सीमा,बंधन और गुलामी में अंतर कर पाने वाली,
उपहास,आलोचना,और उलाहना को गर्दो-गुबार करने वाली,
आज़ाद,खूबसूरत और खुले विचारों वाली,
जीवन से भरपूर वो पागल लड़की बनके आना।
मुझे तुम वैसी ही अच्छी लगती हो।

नैतिकता और आदर्शवाद के पुराने उदाहरण पर्याप्त हैं
हम बेटिओं,बहनों और स्त्रिओं के जीवन मूल्य तय करने के लिए
अब मेरे कस्बे की लडकियां तुम्हारे स्वछंद,स्वतंत्र
और बिंदास होने का उदाहरण देखना चाहती हैं,
समाज की परम्पराओं की जंजीरों में जकड़ी ये लडकियां,
तुम्हारे उस बिंदास व्यक्तित्व में कहीं न कहीं,
खुद का भी तुम्हारी तरह होना इमेजिन करती हैं।

                        -एकता नाहर 'मासूम'

Monday, 17 June 2013

चूड़ियाँ टूट ही गईं

लो,आज तो वो चूड़ियाँ भी टूट गईं जो तुम मेरे लिए फ़िरोज़ाबाद से लाये थे। वैसे मैंने तुम्हें बताया नहीं था,वो चूड़ियाँ तो कई दिनों पहले ही चटक गईं थीं...मैं तो वो चटकी हुई चूड़ियाँ ही पहन रही थी। तुमने भी तो कहाँ बताया मुझे कि हमारा रिश्ता चटक रहा है…टूट गया न,चटकते-चटकते।

तुम्हें चूड़ियो के चटकने का पता नहीं चला न, क्योंकि मेरी चूड़ियाँ चटकने के बाद भी पहले की ही तरह खनक रही थीं। मुझे भी कहाँ पता चला रिश्ते की चटक का, मुझे तो सिर्फ उसकी पहले जैसी खनक सुनाई दे रही थी। एक बार ही बता देते मुझे, तो मैं सहेजकर रख देती न,हमारे रिश्ते को अलमारी के किसी कोने में करीने से ....वहीँ,जहां मैं अपनी चूड़ियाँ रखती हूँ।

.......खैर,अब जब सब कुछ टूट ही चूका है तो चलो अच्छा ही हुआ जो आज ये रही-सही चूड़ियाँ भी टूट गईं....वरना, चटकी हुई चूड़ियाँ बेवजह मुझे जख्मी ही करतीं.......

Monday, 10 June 2013

उत्तर समान हो सकते थे ...


फासले तय कर लिए गये… हक़ बाँट लिए गये ..कभी न मिलने की कसमें ले ली गई ..हदें लिख ली गई और तो और किसका कितना प्यार था,कितनी गलतियाँ,ये भी लिख लिया गया...दोनों ही अपने पक्ष और तर्क देकर इसका गडित लगा रहे थे ....अपने हिसाब के दोनों ही पक्के थे ...सूत्र कोई भी लगाया जाये,आखिर में गडित के सवाल का हल सबका एक जैसा ही आता है… पर हम दोनों के उत्तर में असमानता निकली ...तुम्हारे उत्तर में तुम सही थे और मेरे उत्तर में मैं ...ज़रूर कोई भूल हो गई होगी किसी सूत्र के लगाने में ....फिर से जाँचना होगा कि भूल तुम्हारे हिसाब में थी या मेरे ...पर इतना वक़्त कहाँ था ...हम दोनों  ही अपने- अपने रास्ते पे आगे बढ़ चुके थे। हिसाब लगे पन्ने भी रद्दी का सामान हो चुके थे।

(भूल सुधारी जा सकती थी ...रिश्ते को वक़्त दिया जा सकता था ...उत्तर समान हो सकते थे ...)



Saturday, 8 June 2013

काश कि तुम होते तो तुमसे बाँट पाती...अपना दर्द भी ...अपनी राहतें भी...

टूटते बनते विश्वास,प्यार और अहंकार की तानाबानी में फसे रिश्ते ज्यादा वक़्त तक सांस नही ले पाते। हमारा रिश्ता भी तो कराह रहा है कबसे...हर सुबह खुद से तुम्हे याद न करने का वादा,सारा दिन उस वादे पर कायम रहने की नाकाम सी कोशिश और शाम होने तक अपने वादे को अपने ही पैरों तले रौंद कर तुम्हारे आगोश में बिछते मेरे एहसास। हर दिन बनते बिगड़ते इस रिश्ते, इन नाकाम सी कोशिशो और बेवजह की साजिशो के बीच दिल में टीस उठाता मेरा दर्द…और इस दर्द में राहत देती तुम्हारे पहलू में गुज़ारी रातों की खुशबू....
तुम जानते हो न, तुम्हारे पास आकर मुझे हर दर्द से राहत मिल जाती है...वो सारे दर्द जो न आँखों से आंसू बनकर झलक पाए न जुबान से लब्ज़ बनकर निकल पाए... 

काश!!! काश कि तुम होते तो तुमसे बाँट पाती...अपना दर्द भी...अपनी राहतें भी ...



Tuesday, 4 June 2013

वो बस प्रेम ही लिखती


वो बस प्रेम ही लिखती थी,और ग़ज़ब लिखती थी....पहले लोगों ने कहा कि उसकी कलम में जादू है,फ़िर वो उसे पागल कहने लगे और वह उसे ही उपलब्धि समझ बैठी। पागल (पा गल) तो वो होता है न,जिसने कोई गल पा ली हो...मीराबाई,हाँ उन्हें पागल कहा जा सकता है..प्रेम की गल जो पा ली थी उन्होंने।


उसे भी लोगों ने पागल,दीवानी,बावली,न जाने क्या-क्या कहा ...आकाश उसे एकटक देखता रहा ताकि वो उसकी विशालता लिखे। मौसम ने अपनी सब हरकतों से उसे रिझाने की कोशिश की। कुदरत में हर रोज़ नए करिश्मे होते रहे मगर वह अपनी वहीँ पुरानी प्रीत लिखती रही उसने तो अपनी जीभ पे प्रेम की डली रख ली थी,वह उसी का स्वाद चखती थी बाकी सब उसे फीका लगता था।उसे चुटकुले लिखकर लोगों को गुदगुदाना नहीं आया...वीरों की वीरता और महापुरुषों की महानता भी उसकी कलम से अछूती ही  रही ....

ओस की बूंदों की नरमी,रिमझिम फुहारें,गोबर से लिपे आँगन में खेलती नन्ही-सी गुडिया,कोलतार बिछी खाली सड़क पर ठेला चलता वो लड़का,बगीचे में खिलते गुड़हल के लाल फूल...जाने कितने ही विषयों को पनाह दे रहे थे एक से एक महान कवि ...मगर वो सब विषयों से रिक्त थी...उसने तो अपनी कलम को प्रेम की स्याही में डुबो रक्खा था ..ज्यों ही कागज़ पर कुछ उकेरती...प्रेम ही उल्छरता।

कुछ लोगों ने कहा कि वो प्रेम में है, अनुमान लगाकर उसके प्रेम को नाम और शक्ल भी दी। मगर वो कहती थी कि  प्रेम उसमे है...प्रेम उससे लिखवाता है अपनी परिभाषा...कभी वो अपने प्रेम को इश्वर की शक्ल देती तो कभी कुछ महान प्रेमिओ के किस्से लिखकर अपने प्रेम से कागज़ को रंग देती। 

उसे प्रेम के सिवा कोई दूसरा शब्द लिखना ही नहीं आया,वो पागल ही सही पर वो लिख रही है, अब भी प्रेम ही लिख रही है ......



वो पहली कविता..

तुम्हे  वो कविता याद है, जो मैंने पहली बार तुम्हारे लिए लिखी थी ...जितने ध्यान से मेरा दो साल का भतीजा यश तितलियाँ देखता है न और जितने ध्यान से तुम अपने ऑफिस और घर की जिम्मेदारियाँ निभाते हो,उतने ही ध्यान से लिखी थी,मैंने वह कविता तुम्हारे लिये. ..और तुमने भी तो उसको पढ़कर चूम लिया था,मैंने कहा था बस करो, कितनी बार पढोगे ......
           ......तुम भूल चुके हो न वह कविता, मुझे भी कहाँ याद थी ...वो तो आज पन्ने पलटते हुए वह कविता सामने आ गई। स्याही फीकी पड़ चुकी थी,कागज़ भी कुछ मुड़ सा गया था ...पर पन्नों के साथ अहसास कहाँ पुराने हुए,कविता भूलने से यादें कहाँ भूली ...जानती हूँ पन्ने पलटने से वक़्त नहीं पलटता ...पर शायद पलटता हो कि अगर तुम भी पलट लो कुछ पन्ने… तुम्हारे सामान में भी रखी हो कोई कविता ...कोई ख़त ...जिसके पढने से तुम्हे भी महसूस हो की अहसास पुराने नहीं होते ...और फिर शायद पलट जाये हमारा वक़्त…