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Tuesday, 4 June 2013

वो बस प्रेम ही लिखती


वो बस प्रेम ही लिखती थी,और ग़ज़ब लिखती थी....पहले लोगों ने कहा कि उसकी कलम में जादू है,फ़िर वो उसे पागल कहने लगे और वह उसे ही उपलब्धि समझ बैठी। पागल (पा गल) तो वो होता है न,जिसने कोई गल पा ली हो...मीराबाई,हाँ उन्हें पागल कहा जा सकता है..प्रेम की गल जो पा ली थी उन्होंने।


उसे भी लोगों ने पागल,दीवानी,बावली,न जाने क्या-क्या कहा ...आकाश उसे एकटक देखता रहा ताकि वो उसकी विशालता लिखे। मौसम ने अपनी सब हरकतों से उसे रिझाने की कोशिश की। कुदरत में हर रोज़ नए करिश्मे होते रहे मगर वह अपनी वहीँ पुरानी प्रीत लिखती रही उसने तो अपनी जीभ पे प्रेम की डली रख ली थी,वह उसी का स्वाद चखती थी बाकी सब उसे फीका लगता था।उसे चुटकुले लिखकर लोगों को गुदगुदाना नहीं आया...वीरों की वीरता और महापुरुषों की महानता भी उसकी कलम से अछूती ही  रही ....

ओस की बूंदों की नरमी,रिमझिम फुहारें,गोबर से लिपे आँगन में खेलती नन्ही-सी गुडिया,कोलतार बिछी खाली सड़क पर ठेला चलता वो लड़का,बगीचे में खिलते गुड़हल के लाल फूल...जाने कितने ही विषयों को पनाह दे रहे थे एक से एक महान कवि ...मगर वो सब विषयों से रिक्त थी...उसने तो अपनी कलम को प्रेम की स्याही में डुबो रक्खा था ..ज्यों ही कागज़ पर कुछ उकेरती...प्रेम ही उल्छरता।

कुछ लोगों ने कहा कि वो प्रेम में है, अनुमान लगाकर उसके प्रेम को नाम और शक्ल भी दी। मगर वो कहती थी कि  प्रेम उसमे है...प्रेम उससे लिखवाता है अपनी परिभाषा...कभी वो अपने प्रेम को इश्वर की शक्ल देती तो कभी कुछ महान प्रेमिओ के किस्से लिखकर अपने प्रेम से कागज़ को रंग देती। 

उसे प्रेम के सिवा कोई दूसरा शब्द लिखना ही नहीं आया,वो पागल ही सही पर वो लिख रही है, अब भी प्रेम ही लिख रही है ......



2 comments:

बृजेन्द्र अग्निहोत्री said...

बुढिमान व्यक्ति की यही समस्या है, वह हर बात को अपने दृष्टिकोण से देखता है......

kavianil carpenter said...

एकता जी काफी
प्रभावी है आपकी लेखनी !