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Tuesday, 4 June 2013

वो पहली कविता..

तुम्हे  वो कविता याद है, जो मैंने पहली बार तुम्हारे लिए लिखी थी ...जितने ध्यान से मेरा दो साल का भतीजा यश तितलियाँ देखता है न और जितने ध्यान से तुम अपने ऑफिस और घर की जिम्मेदारियाँ निभाते हो,उतने ही ध्यान से लिखी थी,मैंने वह कविता तुम्हारे लिये. ..और तुमने भी तो उसको पढ़कर चूम लिया था,मैंने कहा था बस करो, कितनी बार पढोगे ......
           ......तुम भूल चुके हो न वह कविता, मुझे भी कहाँ याद थी ...वो तो आज पन्ने पलटते हुए वह कविता सामने आ गई। स्याही फीकी पड़ चुकी थी,कागज़ भी कुछ मुड़ सा गया था ...पर पन्नों के साथ अहसास कहाँ पुराने हुए,कविता भूलने से यादें कहाँ भूली ...जानती हूँ पन्ने पलटने से वक़्त नहीं पलटता ...पर शायद पलटता हो कि अगर तुम भी पलट लो कुछ पन्ने… तुम्हारे सामान में भी रखी हो कोई कविता ...कोई ख़त ...जिसके पढने से तुम्हे भी महसूस हो की अहसास पुराने नहीं होते ...और फिर शायद पलट जाये हमारा वक़्त… 


1 comments:

V M BECHAIN said...

aapki kvitaye mn ke tar ko chhed deti hai ,,really behd achha or touching likhti h aap