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Monday, 17 June 2013

चूड़ियाँ टूट ही गईं

लो,आज तो वो चूड़ियाँ भी टूट गईं जो तुम मेरे लिए फ़िरोज़ाबाद से लाये थे। वैसे मैंने तुम्हें बताया नहीं था,वो चूड़ियाँ तो कई दिनों पहले ही चटक गईं थीं...मैं तो वो चटकी हुई चूड़ियाँ ही पहन रही थी। तुमने भी तो कहाँ बताया मुझे कि हमारा रिश्ता चटक रहा है…टूट गया न,चटकते-चटकते।

तुम्हें चूड़ियो के चटकने का पता नहीं चला न, क्योंकि मेरी चूड़ियाँ चटकने के बाद भी पहले की ही तरह खनक रही थीं। मुझे भी कहाँ पता चला रिश्ते की चटक का, मुझे तो सिर्फ उसकी पहले जैसी खनक सुनाई दे रही थी। एक बार ही बता देते मुझे, तो मैं सहेजकर रख देती न,हमारे रिश्ते को अलमारी के किसी कोने में करीने से ....वहीँ,जहां मैं अपनी चूड़ियाँ रखती हूँ।

.......खैर,अब जब सब कुछ टूट ही चूका है तो चलो अच्छा ही हुआ जो आज ये रही-सही चूड़ियाँ भी टूट गईं....वरना, चटकी हुई चूड़ियाँ बेवजह मुझे जख्मी ही करतीं.......

2 comments:

संजय भास्‍कर said...

सार्थक और बेहद खूबसूरत,प्रभावी,उम्दा रचना है..शुभकामनाएं।

मदन मोहन सक्सेना said...

सुन्दर ,सरल और प्रभाबशाली रचना। बधाई। कभी यहाँ भी पधारें।
सादर मदन
http://saxenamadanmohan1969.blogspot.in/
http://saxenamadanmohan.blogspot.in/