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Saturday, 8 June 2013

काश कि तुम होते तो तुमसे बाँट पाती...अपना दर्द भी ...अपनी राहतें भी...

टूटते बनते विश्वास,प्यार और अहंकार की तानाबानी में फसे रिश्ते ज्यादा वक़्त तक सांस नही ले पाते। हमारा रिश्ता भी तो कराह रहा है कबसे...हर सुबह खुद से तुम्हे याद न करने का वादा,सारा दिन उस वादे पर कायम रहने की नाकाम सी कोशिश और शाम होने तक अपने वादे को अपने ही पैरों तले रौंद कर तुम्हारे आगोश में बिछते मेरे एहसास। हर दिन बनते बिगड़ते इस रिश्ते, इन नाकाम सी कोशिशो और बेवजह की साजिशो के बीच दिल में टीस उठाता मेरा दर्द…और इस दर्द में राहत देती तुम्हारे पहलू में गुज़ारी रातों की खुशबू....
तुम जानते हो न, तुम्हारे पास आकर मुझे हर दर्द से राहत मिल जाती है...वो सारे दर्द जो न आँखों से आंसू बनकर झलक पाए न जुबान से लब्ज़ बनकर निकल पाए... 

काश!!! काश कि तुम होते तो तुमसे बाँट पाती...अपना दर्द भी...अपनी राहतें भी ...



3 comments:

K C said...

कभी लिखा ही नहीं जाता मुकम्मल रंग ज़िंदगी का, कभी ये आप उतरती है शब्दों में.... वो होता तो जाने क्या क्या होता।

expression said...

तुम होते तो दर्द कहाँ होते......

काश कि तुम होते................

अनु

guftgu allahabad said...

बहुत खूब, दिल से लिखा डूबकर. मुबारकबाद