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Saturday, 21 January 2017

एक और डायरी पेज -4


अब उसके कांधों पर सहारे वाले हाथ नहीं रहे। घर का बिखरा सामान जगह पर रखा जा चुका था, मैले कपड़ें धोए जा चुके थे। आते-जाते हर शख्स ने कहा कि सब पहले जैसा हो जाएगा पर वह कहां चाहती थी कुछ भी पहले जैसा...दरअसल उसे नएपन की जरूरत थी। वह सोच कही थी कि क्या करे... क्या सिगरेट ट्राइ की जाए या फिर किसी भरोसे वाले दोस्त से कहकर एक व्हिस्की मंगाई जाए। नए दोस्त बनाए जाएं या पुराने भी छोड़ दिए जाएं। शोर-शराबों वाली पार्टी में रातें गुजारी जाएं या अकेले किसी पहाड़ पर बैठकर चीखा जाए। किसी अनजान के साथ सेक्स कर अपने शरीर के बंधनों से मुक्त हुआ जाए या खुद से ही प्रेम कर किसी को खुद को छूने भी न दिया जाए। अकेले रात-रात जागकर खूब सारी किताबें पढ़ी जाएं या बिना बिना सोचे-समझे नौकरी छोड़ कर दुनिया घूमने निकल जाया जाए। खुद को भटकने दिया जाए या अब बस इस भटकाव से थम जाया जाए। नएपन के रास्ते तमाम थे...सही गलत का फर्क उसे पुराने में ही धकेलता था। उसने तय किया कि वह जिएगी, वह उड़ेगी, वह खुलेगी, वह नए रास्तों पर चलेगी। उसे नहीं पता था कि इस बार वह भटकेगी या नहीं बस उसे इतना पता था कि अब वह न भटकने के डर में नहीं जिएगी। उसने कमरे के सामान को नए तरीके से जमाया, कुछ नए कपड़े खरीदे और गोवा की एक टिकिट कर बिना प्लान वाले ट्रिप पर निकल पड़ी....
-एकता


Friday, 20 January 2017

एक और डायरी पेज -३


वह जान गयी थी कि उसके मुठ्ठी भर आसूंओं से किसी के मन का मैल नहीं धुल सकता था। उसके हिस्से के दर्द की गठरी को कोई और अपनी पीठ पर नहीं ढो सकता था और कोई देवदूत आकर उसकी हथेली में जमे आंसूओं को चूमकर उसे उस डरावनी गुफा से आजाद नहीं कर सकता था। उसने देखा कि उस दिन उसके सपनों की कब्र पर तमाम गुलाब रखे गए, तमाम हाथ उसके कंधे तक भी पहुंचे। उस दिन वह यह भी जान गयी थी कि अब अगले कई सालों तक अपने ही सपनों की लाशों का मातम भी उसे ही मनाना था और मुरझाए गुलाबों का कचरा भी उसे ही साफ करना था। सबने कहा था उससे कि सपनों की कोई उम्र नहीं होती, फिर भी उस लड़की ने सही सपनों को जन्म देने की प्रसव पीढ़ा तो फिर कैसे बर्दाश्त होता गर्भपात कराने वाले इस समाज को उन सपनों का पाला जाना। उसकी रेशमी सपनों की गठरी को तार-तार करने के लिए तो एक खंजर ही काफी था, फिर उस पर तो सैकड़ों तलवारें चलाई गयीं। वो कंधे तक पहुँचने वाले हाथ वही तलवारों वाले हाथ थे। सपनों की मौत तो एक हादसा था। असल दुःख तो उन हाथों के बोझ का है, जो उसके कन्धों को निर्बल और शक्तिहीन कर रहे हैं।


एक और डायरी पेज-२

उसके घर अब न रात को लाइट बंद होती है, न सुबह का अलार्म बजता है। दोपहर के ११, शाम के ७ और सुबह के ४ बिस्तर की करवटों में कब बदलते रहते हैं, उसे कुछ पता नहीं चलता। उसे लगता जैसे उसकी ज़िन्दगी भी किसी गोल घड़ी में सुई बनकर घूमती जा रही हो। नए साल के रिजोल्यूशन डायरी में बंद अगले साल का इंतज़ार कर रहे हैं। उस हादसे के बाद वह डरी ज्यादा थी या टूटी, इससे किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता। सबको फर्क इस बात से पड़ता है कि इस हादसे के होने में उसकी गलती कितनी थी। जो लोग आये दिन उसे अपने साथ कॉफ़ी पे ले जाने के लिए ताकते रहते, वे आपस में इस बात की ख़ुशी मना रहे थे कि अच्छा हुआ जो हम इसके दोस्त नहीं हैं, वरना बेवजह हम भी फसते। वह लड़ना नहीं चाहती, वह जख्मी है, उसके पास न हथियार हैं न ताकत। उसने खुद से सवाल किया कि क्या वह हारकर प्रेम कविता लिखना स्वीकार ले।



एक और डायरी पेज-१


आज पूरे पांच दिन हो गए थे। उस खूबसूरत लड़की के चेहरे पर ब्लैक हेड्स और बालों में डेंड्रफ दिखने लगा था। कपड़े नहीं बदले थे उसने, ऑफिस से लेकर सोने तक वही जीन्स टॉप और जैकेट उसके बदन से चिपक गए थे। जो आइना दिन रात उसे घूरता था, उस आईने ने उसे पांच दिन से ठीक से देखा तक नहीं था। उसके घर की चादर पर सिलवट भी आ जाए तो वो मेहमानों के सामने ही बिस्तर ठीक करने लगती, आज उसके घर पर जगह जगह कपड़े, झूठे बर्तन और जूते बिखरे थे। उसके घर से अब तेज म्यूजिक की आवाज नहीं आती, बस एक ख़ामोशी-सी पसरी रहती है जैसे किसी ने उसकी चीख के मुँह को जोर से दबा दिया हो। मोबाइल उठाती तो उसे लगता जैसे उसने किसी और के मोबाइल की कॉन्टैक्ट लिस्ट को कॉपी कर लिया हो, वह ढूंढती किसी थोड़ी ज्यादा पहचान वाले कांटेक्ट को, और डायल करते-करते रुक जाती। वह रजाई में मुँह ढँक लेती है और घंटों अपनी आँखों के सामने तमाम यादों को आता-जाता देखती। साथ ही उस हादसे, उस समय और उन लोगों से भी, जिनसे लड़ने का अब उसने फैसला किया है। वह फिर रजाई में मुँह ढंककर अपने मोबाइल में पिंक मूवी रीप्ले कर देती है और सोचती है कि नो का मतलब नो होता है, काश ये समझाना आसान होता।