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Friday, 20 January 2017

एक और डायरी पेज -३


वह जान गयी थी कि उसके मुठ्ठी भर आसूंओं से किसी के मन का मैल नहीं धुल सकता था। उसके हिस्से के दर्द की गठरी को कोई और अपनी पीठ पर नहीं ढो सकता था और कोई देवदूत आकर उसकी हथेली में जमे आंसूओं को चूमकर उसे उस डरावनी गुफा से आजाद नहीं कर सकता था। उसने देखा कि उस दिन उसके सपनों की कब्र पर तमाम गुलाब रखे गए, तमाम हाथ उसके कंधे तक भी पहुंचे। उस दिन वह यह भी जान गयी थी कि अब अगले कई सालों तक अपने ही सपनों की लाशों का मातम भी उसे ही मनाना था और मुरझाए गुलाबों का कचरा भी उसे ही साफ करना था। सबने कहा था उससे कि सपनों की कोई उम्र नहीं होती, फिर भी उस लड़की ने सही सपनों को जन्म देने की प्रसव पीढ़ा तो फिर कैसे बर्दाश्त होता गर्भपात कराने वाले इस समाज को उन सपनों का पाला जाना। उसकी रेशमी सपनों की गठरी को तार-तार करने के लिए तो एक खंजर ही काफी था, फिर उस पर तो सैकड़ों तलवारें चलाई गयीं। वो कंधे तक पहुँचने वाले हाथ वही तलवारों वाले हाथ थे। सपनों की मौत तो एक हादसा था। असल दुःख तो उन हाथों के बोझ का है, जो उसके कन्धों को निर्बल और शक्तिहीन कर रहे हैं।


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