Followers

Friday, 20 January 2017

एक और डायरी पेज-२

उसके घर अब न रात को लाइट बंद होती है, न सुबह का अलार्म बजता है। दोपहर के ११, शाम के ७ और सुबह के ४ बिस्तर की करवटों में कब बदलते रहते हैं, उसे कुछ पता नहीं चलता। उसे लगता जैसे उसकी ज़िन्दगी भी किसी गोल घड़ी में सुई बनकर घूमती जा रही हो। नए साल के रिजोल्यूशन डायरी में बंद अगले साल का इंतज़ार कर रहे हैं। उस हादसे के बाद वह डरी ज्यादा थी या टूटी, इससे किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता। सबको फर्क इस बात से पड़ता है कि इस हादसे के होने में उसकी गलती कितनी थी। जो लोग आये दिन उसे अपने साथ कॉफ़ी पे ले जाने के लिए ताकते रहते, वे आपस में इस बात की ख़ुशी मना रहे थे कि अच्छा हुआ जो हम इसके दोस्त नहीं हैं, वरना बेवजह हम भी फसते। वह लड़ना नहीं चाहती, वह जख्मी है, उसके पास न हथियार हैं न ताकत। उसने खुद से सवाल किया कि क्या वह हारकर प्रेम कविता लिखना स्वीकार ले।



0 comments: